Thursday, December 8, 2016

बिखरते परिवार बिखरती जिंदगियां..............

                  भारत को आज विश्व समुदाय में कई खासियत की वजह से जाना जाता है। उसमें भारतीय समाज की स्थिरता में सशक्त परिवार संस्था के योगदान की भूमिका महत्वपूर्ण है। परिवार संस्था में भी संयुक्त परिवार के महत्व को कभी भी नहीं नकारा जा सकता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आधुनिकीकरण के दौर में संयुक्त परिवार में बिखराव का दौर चरम पर पहुंच रहा है। इससे कई बार परिवार के युवाओं को खासी तकलीफ होती है तो कभी परिवार के मुखिया ऐसी स्थितियों से खुद को टूटता हुआ महसूस करते हैं। फिलहाल नई पीढ़ी को परिवार के बिखराव का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक-दूसरे की भावनाओं को न समझना, त्याग की भावना का खत्म होना, परिवार में महिलाओं के आपसी झगड़े, संपत्ति को लेकर आपसी मनमुटाव जैसे कई कारण है, जो संयुक्त परिवार के विघटन की मजबूत नींव तैयार करते हैं। जिसका हश्र कई जिंदगियों के बिखरने के साथ होता है।
                          भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का आधार एक मुखिया में सबका विश्वास होना था। घर का सबसे बड़ा सदस्य परिवार का मुखिया होता था। मुखिया अपने अधिकार और जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह भी करता था। उसे यह पता रहता था कि परिवार के हर सदस्य की क्या जरूरत है, किसी की भावनाएं तो आहत नहीं हो रही हैं, कोई कमियों से जूझने को मजबूर तो नहीं है...इसके लिए भले ही उसे खुद ही वंचित रहना पड़े लेकिन परिवार के सभी सदस्य खुशी से रह सकें, इस जिम्मेदारी का निर्वहन मुखिया भलीभांति करता था। पंडित दीनदयाल के अंत्योदय यानि कि सबसे कमजोर के उत्थान की तर्ज पर ही परिवार में भी मुखिया इस बात का खास ख्याल रखता था कि घर का छोटा सदस्य आगे बढ़ सके इसके लिए उसे बड़े सदस्यों की तुलना में ज्यादा महत्व देने में भी वह संकोच नहीं करता था। पर लोकतंत्र के इस दौर में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने इन संबंधों को तार-तार कर दिया है। संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं तो एकल परिवार के सदस्य तनाव के दौर से गुजरने को मजबूर हैं।
                       सनातन हिंदू समाज में संयुक्त परिवार की एक झलक रामचरित मानस में अयोध्या के राजा दशरथ के परिवार से देखी जा सकती है। जब उनके बड़े पुत्र राम के वन जाने का फैसला हुआ तो उन चारों भाईयों के बीच जो प्रेम का अटूट बंधन देखने को मिला, परिवार की उस संयुक्त व्यवस्था और इससे परिवार के हर सदस्य में पल्लवित एक-दूसरे के प्रति प्रेम की थाती को महसूस किया जा सकता है। राम के साथ लक्ष्मण ने भी महलों के सुख साधनों को त्यागकर भाई के साथ वन जाने का फैसला किया। वहीं जब भरत ने राजतिलक करवाने से भी इंकार कर दिया। जब राम ने जंगल से वापस लौटने से इंकार कर दिया तो राम की खडाऊं को सिंहासन पर रखकर बड़े भाई के सेवक के बतौर भरत ने चौदह साल तक कर्तव्यों का निर्वहन किया। यानि कि त्याग का कहीं कोई अंत देखने को नहीं मिलता।
                     त्याग करने में सबसे पहला नाम बड़े भाई राम का ही दर्ज हुआ और इसी वजह से संयुक्त परिवारों का महत्व आज तक बना हुआ है। पर ‘त्याग’, ‘प्रेम’ और ‘एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना’ के खत्म होने से संयुक्त परिवार की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। इसकी वजह से समाज में ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, धोखेबाजी का बोलबाला हो गया है और पूरा समाज खामियाजा भुगतने को मजबूर है।
                    भौतिक साधनों में खुशी ढूढ़ने की कोशिश भी अब खोखली साबित हो चुकी है। ऐेसी स्थिति में जरूरत है कि एक बार फिर भारत की मजबूत संयुक्त परिवार संस्था को पुनर्जीवित किया जाए। घर के बड़े सदस्य संकुचित भावनाओं को छोड़ने में समर्थ हों। परिवार में एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र हो और राम की तरह मुखिया के अंदर त्याग, न्याय और समर्पण के भावों की झलक परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन में खुशियों को लौटा सके। उम्मीद से आसमान है और इतिहास अपने आप को दोहराता है। इसके चलते एक बार फिर संयुक्त परिवार के दौर के लौटने की उम्मीद तो की ही जा सकती है कि फिर से राम की तरह विशाल ह्रदय लिए घर के मुखिया का किरदार लौटेगा, भरत और लक्ष्मण तो समाज में अब भी मौजूद हैं। 


Thursday, December 1, 2016

विमुद्रीकरण और सर्कस का खेल

             सर्कस में कलाकारों के कर्तब देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है, उनके करतब कभी रोमांचित करते हैं तो कभी पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर देते हैं। लेकिन सर्कस का यह खेल अब मंदी की चपेट में आ गया है। मंदी की मार सर्कस के खेल को तबाह कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण के करतब पर भी कुछ सर्कस के खेल की परछाईं पड़ी नजर आ रही है। नोटबंदी का करतब दांतों तले उंगली दबाने वाला ही है। यह कभी दर्शक (भारतीय नागरिकों) को रोमांचित करता है तो किन्हीं के शरीर में सिहरन भी पैदा कर रहा है। सर्कस के विरोधी विचारधारा के लोग इसका अंजाम बाजार की मंदी को बता रहे हैं। साथ ही रिंग मास्टर मोदी पर अविवेकपूर्ण फैसला लेने का आरोप भी मढ़ रहे हैं।
                         इस सर्कस के खेल की स्क्रिप्ट ही कुछ इस तरह लिखी गई थी कि विमुद्रीकरण के खेल में कालेधन रखने वालों का बंटाढार हो जाएगा और आतंकवाद अपनी किस्मत पर रोने को मजबूर होगा। जब पर्दा उठा और 500-1000 के पुराने नोट बंद करने की आनन-फानन में घोषणा की गई तो देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हुआ। निश्चित तौर से कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के शरीर में ऐसी सिहरन पैदा हुई कि उनका मानसिक संतुलन अभी तक ठिकाने पर नहीं आ पा रहा है। कभी वह स्क्रिप्ट राइटर मोदी को गाली देने पर उतारू हो जाते हैं तो कभी उसे सर्कस का खेल खेलना भुला देने की चेतावनी देने से भी नहीं चूकते। दर्शकों की ऐसी प्रतिक्रिया का असर ही है कि स्क्रिप्ट राइटर को भी कई बार अपनी स्क्रिप्ट में सुधार करने की गुंजाइश नजर आने लगती है। कभी तीन दिन बाद ही नोटबंदी को पूरी तरह से अमल में लाने की बात कही जाती है तो कभी स्क्रिप्ट में थोड़ा सुधार कर इसकी मियाद बढ़ाने का ऐलान किया जाता है। 
                      सर्कस के इस खेल में अलग-अलग कलाकार अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। कांग्रेस के युवराज कभी नोट बदलवाने के लिए लाइन में लगकर दर्शकों को गुदगुदाते हैं। नोटबंदी को वे अपनों को फायदा पहुंचाने की सोची-समझी साजिश करार देते हैं। आम आदमी पार्टी इसे अन्य दलों के खिलाफ षड्यंत्र बताने की भरसक कोशिश करते हैं। उधर उत्तर प्रदेश से आवाज आती है कि कुछ दिन के लिए तो नोट चलाने का मौका मिलना ही चाहिए। तो पश्चिम बंगाल खेमे से ममता की आंखों से मोदी के प्रति अंगारे टपकते हैं कि मैं तुझे सत्ता से बाहर करके रहूंगी। इस बीच स्क्रिप्ट राइटर मोदी खुद के बचाव में ऐेलान करते हैं कि भाजपा रिंग के सभी विधायकों-सांसदों को 8 नवंबर से दिसंबर तक का एकाउंट डिटेल जमा करना होगा। इस बीच बैंकों पर आरोप की झड़ी लगने लगती है कि वे चीन-चीन कर रेवड़ी बांट रहे हैं। यानि कि  नियमों को ठेंगा दिखाते हुए अपनों को फायदा पहुंचा रहे हैं। कई जगह लाखों के नए नोट एक जगह मिलने पर बैंकों की गड़बड़ी साफ नजर भी आती है। अब इसके लिए सरकार को भले ही कटघरे में खड़ा न किया जा सके लेकिन बैंकों को बख्शा भी नहीं जा सकता।
                      ठीक इसी तरह सर्कस के खेल में कभी सरकार और रिजर्व बैंक में माथापच्ची शुरू हो जाती है। कभी नए नोट स्याही छोड़ने लगते हैं तो रिजर्व बैंक पर उंगली उठती है। रिजर्व बैंक भी पीछे नहीं, वह सफाई दे देता है कि पुराने नोटों से भी स्याही निकलती है। बाद में अपनी गलती का अहसास भी करता है। रिंग मास्टर अपनी स्क्रिप्ट के जरिए सर्कस के सभी जानवरों (राजनीतिक दलों) को खूब छकाता है, खूब उछल-कूद कराता है और कभी आंसू बहाकर अपनी बेबसी का इजहार करने से भी नहीं चूकता। समय मांगता है कि मुझे कुछ समय मिलेगा तो दर्शकों को उसका खेल खूब रास आएगा। फिलहाल सर्कस के इंटरवल तक के खेल में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। फिर भी दर्शकों के चेहरे पर आतंकवाद से राहत मिलने का आंशिक सुकून है। शायद यही वजह है कि नोटबंदी का असर उपचुनावों पर देखने को नहीं मिला है। इससे रिंग मास्टर उत्साहित भी है। 
                        लेकिन असल परिणाम आना बाकी है कि पचास दिन बाद दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान बिखरती है या फिर चेहरे पर मायूसी छाती है। शो के खत्म होने पर तालियों की गड़गड़ाहट होती है या फिर बोर होकर दर्शक मुंह बनाते हुए घरों को लौटता है। तो आइए साहब थोड़ा चैन की सांस लेते हैं और कुछ दिन और देखने के बाद ही रिंग मास्टर और स्क्रिप्ट राइटर के काम का आकलन किया जाएगा...।