Thursday, December 8, 2016
बिखरते परिवार बिखरती जिंदगियां..............
भारत को आज विश्व समुदाय में कई खासियत की वजह से जाना जाता है। उसमें भारतीय समाज की स्थिरता में सशक्त परिवार संस्था के योगदान की भूमिका महत्वपूर्ण है। परिवार संस्था में भी संयुक्त परिवार के महत्व को कभी भी नहीं नकारा जा सकता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आधुनिकीकरण के दौर में संयुक्त परिवार में बिखराव का दौर चरम पर पहुंच रहा है। इससे कई बार परिवार के युवाओं को खासी तकलीफ होती है तो कभी परिवार के मुखिया ऐसी स्थितियों से खुद को टूटता हुआ महसूस करते हैं। फिलहाल नई पीढ़ी को परिवार के बिखराव का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक-दूसरे की भावनाओं को न समझना, त्याग की भावना का खत्म होना, परिवार में महिलाओं के आपसी झगड़े, संपत्ति को लेकर आपसी मनमुटाव जैसे कई कारण है, जो संयुक्त परिवार के विघटन की मजबूत नींव तैयार करते हैं। जिसका हश्र कई जिंदगियों के बिखरने के साथ होता है।
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Thursday, December 1, 2016
विमुद्रीकरण और सर्कस का खेल
सर्कस में कलाकारों के कर्तब देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है, उनके करतब कभी रोमांचित करते हैं तो कभी पूरे शरीर में सिहरन पैदा कर देते हैं। लेकिन सर्कस का यह खेल अब मंदी की चपेट में आ गया है। मंदी की मार सर्कस के खेल को तबाह कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण के करतब पर भी कुछ सर्कस के खेल की परछाईं पड़ी नजर आ रही है। नोटबंदी का करतब दांतों तले उंगली दबाने वाला ही है। यह कभी दर्शक (भारतीय नागरिकों) को रोमांचित करता है तो किन्हीं के शरीर में सिहरन भी पैदा कर रहा है। सर्कस के विरोधी विचारधारा के लोग इसका अंजाम बाजार की मंदी को बता रहे हैं। साथ ही रिंग मास्टर मोदी पर अविवेकपूर्ण फैसला लेने का आरोप भी मढ़ रहे हैं।
इस सर्कस के खेल की स्क्रिप्ट ही कुछ इस तरह लिखी गई थी कि विमुद्रीकरण के खेल में कालेधन रखने वालों का बंटाढार हो जाएगा और आतंकवाद अपनी किस्मत पर रोने को मजबूर होगा। जब पर्दा उठा और 500-1000 के पुराने नोट बंद करने की आनन-फानन में घोषणा की गई तो देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हुआ। निश्चित तौर से कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के शरीर में ऐसी सिहरन पैदा हुई कि उनका मानसिक संतुलन अभी तक ठिकाने पर नहीं आ पा रहा है। कभी वह स्क्रिप्ट राइटर मोदी को गाली देने पर उतारू हो जाते हैं तो कभी उसे सर्कस का खेल खेलना भुला देने की चेतावनी देने से भी नहीं चूकते। दर्शकों की ऐसी प्रतिक्रिया का असर ही है कि स्क्रिप्ट राइटर को भी कई बार अपनी स्क्रिप्ट में सुधार करने की गुंजाइश नजर आने लगती है। कभी तीन दिन बाद ही नोटबंदी को पूरी तरह से अमल में लाने की बात कही जाती है तो कभी स्क्रिप्ट में थोड़ा सुधार कर इसकी मियाद बढ़ाने का ऐलान किया जाता है।
सर्कस के इस खेल में अलग-अलग कलाकार अपनी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। कांग्रेस के युवराज कभी नोट बदलवाने के लिए लाइन में लगकर दर्शकों को गुदगुदाते हैं। नोटबंदी को वे अपनों को फायदा पहुंचाने की सोची-समझी साजिश करार देते हैं। आम आदमी पार्टी इसे अन्य दलों के खिलाफ षड्यंत्र बताने की भरसक कोशिश करते हैं। उधर उत्तर प्रदेश से आवाज आती है कि कुछ दिन के लिए तो नोट चलाने का मौका मिलना ही चाहिए। तो पश्चिम बंगाल खेमे से ममता की आंखों से मोदी के प्रति अंगारे टपकते हैं कि मैं तुझे सत्ता से बाहर करके रहूंगी। इस बीच स्क्रिप्ट राइटर मोदी खुद के बचाव में ऐेलान करते हैं कि भाजपा रिंग के सभी विधायकों-सांसदों को 8 नवंबर से दिसंबर तक का एकाउंट डिटेल जमा करना होगा। इस बीच बैंकों पर आरोप की झड़ी लगने लगती है कि वे चीन-चीन कर रेवड़ी बांट रहे हैं। यानि कि नियमों को ठेंगा दिखाते हुए अपनों को फायदा पहुंचा रहे हैं। कई जगह लाखों के नए नोट एक जगह मिलने पर बैंकों की गड़बड़ी साफ नजर भी आती है। अब इसके लिए सरकार को भले ही कटघरे में खड़ा न किया जा सके लेकिन बैंकों को बख्शा भी नहीं जा सकता।
ठीक इसी तरह सर्कस के खेल में कभी सरकार और रिजर्व बैंक में माथापच्ची शुरू हो जाती है। कभी नए नोट स्याही छोड़ने लगते हैं तो रिजर्व बैंक पर उंगली उठती है। रिजर्व बैंक भी पीछे नहीं, वह सफाई दे देता है कि पुराने नोटों से भी स्याही निकलती है। बाद में अपनी गलती का अहसास भी करता है। रिंग मास्टर अपनी स्क्रिप्ट के जरिए सर्कस के सभी जानवरों (राजनीतिक दलों) को खूब छकाता है, खूब उछल-कूद कराता है और कभी आंसू बहाकर अपनी बेबसी का इजहार करने से भी नहीं चूकता। समय मांगता है कि मुझे कुछ समय मिलेगा तो दर्शकों को उसका खेल खूब रास आएगा। फिलहाल सर्कस के इंटरवल तक के खेल में मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। फिर भी दर्शकों के चेहरे पर आतंकवाद से राहत मिलने का आंशिक सुकून है। शायद यही वजह है कि नोटबंदी का असर उपचुनावों पर देखने को नहीं मिला है। इससे रिंग मास्टर उत्साहित भी है।
लेकिन असल परिणाम आना बाकी है कि पचास दिन बाद दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान बिखरती है या फिर चेहरे पर मायूसी छाती है। शो के खत्म होने पर तालियों की गड़गड़ाहट होती है या फिर बोर होकर दर्शक मुंह बनाते हुए घरों को लौटता है। तो आइए साहब थोड़ा चैन की सांस लेते हैं और कुछ दिन और देखने के बाद ही रिंग मास्टर और स्क्रिप्ट राइटर के काम का आकलन किया जाएगा...।
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