आज २५ जनवरी २०१६ है, हर दिन जैसे ही है , कुछ अलग अगर है तो बस पापा नहीं है उनकी आवाज नहीं है, वो आवाज जो भोपाल में मेरे रहने का मुझे अहसास दिलाती थी, जो हर सुबह आवाज लगा कर मुझे उठाते थे , आवाज भी ऐसे लगते थे की सिर्फ सोने वाले को समझ आ जाए की उठो भाई कितनी देर तक सोते रहोगे । उठो क्योकि अब कुछ करने की योजना बनाओ, उठो क्योकि अब कल किये गए कामो की समीक्षा करो क्या सही किया क्या गलत किया, उठो क्यों की मेरे पास बैठो और देखो मेरे आखो से सुने मेरे बातो से की कल तुमने जो किया वो सही था की गलत था । वो सवाल जो सवाल और जवाब दोनों ही था " आज का क्या प्रोग्राम है जी ?" सवाल इसलिए की दिन का पूरा इस्तमाल करना है तो
योजना बनाई हे ? और जवाब की जो योजना बनाई है उसमे कितनी तैयार है या जो कमी है उसको कैसे पूरा करना है ।
तब लगता था के हाँ ठीक है, सब के पापा एक ही काम करते है, और हर बेटा ऐसे सवाल जवाब का दौरा ऐसा सुबह उठना हर घर में आम है, पर आज वो आवाज सुनने को पता नहीं क्यों कान तरस रहे है, घर के हर कोने में उनके कमरे मैं जाने को पता नहीं क्यो सहस्ता मन तड़प रहा है , कही से तो आवाज दो पापा । आप कहा हो पापा कही से तो आवाज दो हर छोटी सी अाहट मे लगता है की जा कर देखू और नकार दू उस सच को जिस सच को कुछ दिन पहले ही मुखाग्नि में स्वाम अपने हातो से देकर आया हु । आज वो सवाल पूछने वाला कोई नहीं है , पर मन सहज ही सवाल उठाता है की क्यों नहीं हो आप पापा ?
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