Wednesday, November 9, 2016

मोदी का क्रांतिकारी कदम


 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर को अचानक तय हुए राष्ट्रीय संबोधन को लेकर भारतीय नागरिकों में बहुत जिज्ञासाएं थीं। जिज्ञासाएं किसी क्रांतिकारी कदम की आहट तो पा चुकी थीं, लेकिन यह पता नहीं था कि यह क्या होगा? दिनभर के घटनाक्रम में तीनों सेनाओं के अध्यक्षों से मुलाकात और उसके बाद प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति से मुलाकात से स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही आ रही थी कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जिस तरह से सीमा पर तनाव चल रहा है, उसको लेकर कोई कड़ा फैसला लिया जा सकता है। यानि कि पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा की जा सकती है। देश में आपातकाल की स्थिति निर्मित हो सकती है। लेकिन मोदी के राष्ट्रीय संबोधन के बाद कयास झूठे पड़ गए। कदम तो क्रांतिकारी उठाया गया लेकिन यह देश के अंदर इकॉनोमिक सर्जरी से जुड़ा हुआ था। आतंकवाद से बड़ी समस्या देश के अंदर फैला भ्रष्टाचार, जमा कालाधन और नकली मुद्रा के चलन को पूरी तरह से खत्म करने की दिशा में एक कड़ा फैसला लिया गया। प्रधानमंत्री ने साफ किया कि यह भी एक तरह की राष्ट्रभक्ति है। राष्ट्रहित में 500 और 1000 रुपए की मुद्रा पर रोक लगा दी गई। 8 नवम्बर की रात से आम आदमी के लिए यह नोट पूरी तरह से चलन से बाहर हो गए, सिवाय उन सेवाओं के जहां सरकार ने महज तीन दिन के लिए इन नोटों के चलन की अनुमति दी है। 

नोटों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को इतना गोपनीय रखा गया कि किसी को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद देश में आमूलचूल परिवर्तन की दिशा में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। मोदी की वसुधैव कुटुंबकम की सोच के साथ देश की दुनिया में अलग छवि बन चुकी है। आतंकवाद के मुद्दे पर चीन को छोड़कर दुनिया के सभी ताकतवर देश भारत का साथ देने को तैयार हैं। आर्थिक विकास की दर में इजाफा हुआ है। कालाधन और भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी की साफ सोच बनने लगी है। मोदी सरकार ने नोटों पर प्रतिबंध लगाने से पहले लोगों को कालाधन समर्पित करने के लिए योजना चलाई थी। इसका फायदा भी लाखों लोगों ने उठाया और कालेधन को आयकर के सामने उजागर किया। इसके बाद सरकार ने दूरगामी फैसला लेते हुए 500, 1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को क्रियान्वित कर साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार के जरिए काली कमाई करने वाले लोगों को इससे ज्यादा मोहलत नहीं दी जा सकती। पड़ोसी देश से आ रहे नकली नोटों पर रोक लगाना भी इसका एक मकसद है लेकिन बहुतायत में बड़ी करेंसी का दुरुपयोग देश के नागरिकों द्वारा ही किया जा रहा था, जिस पर रोक लगाने के लिए इस तरह का कड़ा फैसला लेना शायद जरूरी हो गया था। 

इस ऐतिहासिक फैसले के साथ संयोग ही रहा कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए हो रहे चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की ऐतिहासिक जीत हुई है। डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना, डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की तुलना में भारत के लिए ज्यादा हितकर हो सकता है, ठीक उसी तरह देश में प्रधानमंत्री मोदी का आर्थिक क्रांति का यह फैसला देश के युवाओं के स्वर्णिम भविष्य में सहयोगी साबित होगा। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोग भ्रष्टाचार और काली कमाई से तौबा करें। नए नोटों के जरिए भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसना तय माना जा रहा है। भ्रष्टाचार के कारण युवाओं को जीवन के अलग-अलग मुकामों पर हताशा का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थितियां खत्म होंगी और युवाओं की सोच पूरी तरह से ईमानदारी की राह पर चलकर देश को आगे ले जाने की बन सकेगी। काली कमाई की इच्छा खत्म होगी तो अर्थव्यवस्था ज्यादा पारदर्शी होगी और राष्ट्रहित में धन का बेहतर उपयोग हो सकेगा। इससे रोजगार के ज्यादा साधन मुहैया कराए जा सकेंगे। कालाधन पर बंदिश लगेगी तो चुनावों में हो रहे कालेधन के उपयोग पर प्रतिबंध लग सकेगा। इससे वोटों की खरीद-फरोख्त की वजह से युवाओं के मन-मस्तिष्क में बन रही देश की गलत छवि की गुंजाइश खत्म हो सकेगी। नकली मुद्रा के चलन से बाहर होने पर आतंकवादियों और अराजक तत्वों पर शिकंजा कसा जा सकेगा। निश्चित तौर से मोदी का यह क्रांतिकारी फैसला देश में ईमानदारी, पारदर्शिता और तरक्की की नई फसल बोएगा। देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले पांच साल के कार्यकाल में ही उस मुकाम पर पहुंच सकेगा, जिसमें राष्ट्रहित और मानवीय मूल्यों की साफ सोच भारत के हर नागरिक के मन-मस्तिष्क में अंकित हो सकेगी। ‘सत्यमेव जयते’ की मंजिल पर पहुंचने का प्रयास कर हर नागरिक खुद को गौरवान्वित महसूस कर सकेगा।

Thursday, November 3, 2016

आज के युवाओं के सामने चुनौतियां...

यु वा और चुनौतियां एक दूसरे के पर्याय हैं। पर लग रहा है कि आज का युवा भविष्य की चुनौतियों से भाग रहा है। महानगरों में हालात ज्यादा खराब हैं। परिवारों के बिखराव और सिमटते परिवारों, बदलते सामाजिक सरोकारों, आसपास के परिवेश में आए बदलाव, आधुनिक जीवन शैली और संचार के बढ़ते साधनों ने बचपने को खत्म किया है तो युवाओं को भटकाया   भी है।

बच्चा छोटा होता है और जब बढ़ता है तो उसकी हरेक हरकत पर हम खुश होते हैं। घर के आंगन में उसकी लोटपोट और हर शैतानी को मां पिता ही नहीं पूरा परिवार सहजभाव से लेता है। लेकिन बचपने को सहजभाव से लेने के लिए जब परिवार ही तैयार नहीं है यही बच्चा बड़े होने की प्रक्रिया में कुछ ऐसी बातें करने लगता है तो नागवार होती हैं। बच्चों को बचपन से संस्कार सिखाने की परम्परा हमारे देश में रही है। संयुक्त परिवारों के बीच रहने से यह बेहद आसान होता है। घर के बड़े बुजुर्ग, बच्चों में ऐसी आदतों के बीज बो देते हैं जो ताउम्र उनके काम आती है। बच्चे के मस्तिष्क में बालकाल में जिस तरह के संस्कारों की छाप पड़ जाती है वह उसके भविष्य की धरोहर तो होती हैं बल्कि कई मौकों पर उसे सम्मान भी दिलाती हैं। 

वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता चला गया और फिर बदलाव की यह गति तेज हो गई, बहुत कुछ इतना पीछे छूट गया कि उसे पाना असंभव हो गया। न अब बच्चों को दादा-दादी कहानियां सुनाकर सुलाते हैं ओर न ही मां को लोरियां आती हैं। यहां तक कि बच्चे के लालन पालन के लिए भी मां-बाप गूगल पर निर्भर हो गए हैं। हर समस्या का समाधान वह गूगल पर सर्च कर रहे हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि बच्चे की नैसर्गिक क्रियाओं को भी बाधित करने की कोशिश की जा रही है। मां-बाप के झगड़ों ने सिंगल पैरेंटिंग सिस्टम का नया जमाना ला दिया है। बच्चा बस किसी एक के पास पल रहा है। या बहुत छोटे या कहें माइक्रो फैमिली में पल रहा है तो अकेलेपन का अहसास बचपन से लेकर उसकी जवानी तक, उसे ड्रग्स सहित बुरी आदतों और संगत की तरफ आकर्षित कर रहा है। 

 एक समय था जब सिर पर सीधा हाथ रखकर उल्टी दिशा का कान जब तक पकड़ में न आए बच्चे को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाया जाता था, लेकिन आज जन्म के साल भर बाद ही झूलाघर में एडमिट करा दिया जाता है। महज तीन साल की उम्र में तो बच्चा बस्ता लेकर स्कूल जाने लगता है और तो और कक्षा पांच और अधिक से अधिक आठवीं तक पहुंचते पहुंचते तो उसे मोबाइल, कंम्यूटर सब हासिल हो रहा है। मां, बाप, शिक्षक और पास पड़ोस की बजाय यही अब उसके साथी हैं। जाहिर है, बचपन, किशोर अवस्था तक आते आते समय से पहले वयस्क हो रहा है। तर्क यह है कि जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगाई के दौर में पति-पत्नी का काम करना जरूरी हो गया है। माता पिता की सोच यह है कि वह अपने बच्चे के लिए कुर्बानी दे रहे हैं लेकिन कर वह ठीक इसके विपरीत रहे हैं। उनका बच्चा जिस उम्र में है, उस उम्र में उसे संस्कार, परम्परा और अच्छी शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा किताबी नहीं बल्कि वह जो उसे जीवनभर याद रहे। पर इसके लिए वक्त नहीं। अपनी सुविधाओं के लिए परिवार जो कभी संयुक्त थे, वह विखंडित होकर एकल में बदल गए। यानि कि बच्चे को पुरानी पीढ़ी से कोसों दूर करने की घातक कोशिश में हम सफल हो गए। हमने अपना भविष्य जिस बच्चे में देखा वह धीरे धीरे न जाने कब आपसे से ही विलग हो गया। वह इतना दूर चला गया कि उसने अपनी दूसरी दुनिया आबाद कर ली। दिन भर या तो टीवी या फिर मोबाइल या कंप्यूटर। घर में रहकर भी वह बेगाना हो गया। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कभी दोस्तों का सहारा खोजा और नहीं तो नशे की ओर मुड़ गया। घर में रहकर भी उससे बात करना मुश्किल हो गया। अब इसका दोष उसके माथे तो मढ़ा नहीं जा सकता क्योंकि इसकी बुनियाद तो हम ही डाल रहे हैं। इसलिए बेहद जरूरी यह है कि हम भले ही कितने विकसित क्यों न हो जाएं बच्चों के लालन पालन में नैसर्गिक व्यवस्थाओं का पालन करें। अन्यथा जिस सुख की कल्पना कर रहे हैं वह कभी हासिल नहीं होगा। युवावस्था में भी आज के दौर में युवाओं के अच्छे मित्र उनके माता, पिता और शिक्षक ही हो सकते हैं। और कोई नहीं।