प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 8 नवंबर को अचानक तय हुए राष्ट्रीय संबोधन को लेकर भारतीय नागरिकों में बहुत जिज्ञासाएं थीं। जिज्ञासाएं किसी क्रांतिकारी कदम की आहट तो पा चुकी थीं, लेकिन यह पता नहीं था कि यह क्या होगा? दिनभर के घटनाक्रम में तीनों सेनाओं के अध्यक्षों से मुलाकात और उसके बाद प्रधानमंत्री की राष्ट्रपति से मुलाकात से स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही आ रही थी कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जिस तरह से सीमा पर तनाव चल रहा है, उसको लेकर कोई कड़ा फैसला लिया जा सकता है। यानि कि पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा की जा सकती है। देश में आपातकाल की स्थिति निर्मित हो सकती है। लेकिन मोदी के राष्ट्रीय संबोधन के बाद कयास झूठे पड़ गए। कदम तो क्रांतिकारी उठाया गया लेकिन यह देश के अंदर इकॉनोमिक सर्जरी से जुड़ा हुआ था। आतंकवाद से बड़ी समस्या देश के अंदर फैला भ्रष्टाचार, जमा कालाधन और नकली मुद्रा के चलन को पूरी तरह से खत्म करने की दिशा में एक कड़ा फैसला लिया गया। प्रधानमंत्री ने साफ किया कि यह भी एक तरह की राष्ट्रभक्ति है। राष्ट्रहित में 500 और 1000 रुपए की मुद्रा पर रोक लगा दी गई। 8 नवम्बर की रात से आम आदमी के लिए यह नोट पूरी तरह से चलन से बाहर हो गए, सिवाय उन सेवाओं के जहां सरकार ने महज तीन दिन के लिए इन नोटों के चलन की अनुमति दी है।
नोटों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को इतना गोपनीय रखा गया कि किसी को इसकी भनक तक नहीं लग सकी। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद देश में आमूलचूल परिवर्तन की दिशा में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। मोदी की वसुधैव कुटुंबकम की सोच के साथ देश की दुनिया में अलग छवि बन चुकी है। आतंकवाद के मुद्दे पर चीन को छोड़कर दुनिया के सभी ताकतवर देश भारत का साथ देने को तैयार हैं। आर्थिक विकास की दर में इजाफा हुआ है। कालाधन और भ्रष्टाचार को लेकर आम आदमी की साफ सोच बनने लगी है। मोदी सरकार ने नोटों पर प्रतिबंध लगाने से पहले लोगों को कालाधन समर्पित करने के लिए योजना चलाई थी। इसका फायदा भी लाखों लोगों ने उठाया और कालेधन को आयकर के सामने उजागर किया। इसके बाद सरकार ने दूरगामी फैसला लेते हुए 500, 1000 के नोटों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को क्रियान्वित कर साफ कर दिया कि भ्रष्टाचार के जरिए काली कमाई करने वाले लोगों को इससे ज्यादा मोहलत नहीं दी जा सकती। पड़ोसी देश से आ रहे नकली नोटों पर रोक लगाना भी इसका एक मकसद है लेकिन बहुतायत में बड़ी करेंसी का दुरुपयोग देश के नागरिकों द्वारा ही किया जा रहा था, जिस पर रोक लगाने के लिए इस तरह का कड़ा फैसला लेना शायद जरूरी हो गया था।
इस ऐतिहासिक फैसले के साथ संयोग ही रहा कि अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए हो रहे चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की ऐतिहासिक जीत हुई है। डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना, डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की तुलना में भारत के लिए ज्यादा हितकर हो सकता है, ठीक उसी तरह देश में प्रधानमंत्री मोदी का आर्थिक क्रांति का यह फैसला देश के युवाओं के स्वर्णिम भविष्य में सहयोगी साबित होगा। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोग भ्रष्टाचार और काली कमाई से तौबा करें। नए नोटों के जरिए भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसना तय माना जा रहा है। भ्रष्टाचार के कारण युवाओं को जीवन के अलग-अलग मुकामों पर हताशा का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थितियां खत्म होंगी और युवाओं की सोच पूरी तरह से ईमानदारी की राह पर चलकर देश को आगे ले जाने की बन सकेगी। काली कमाई की इच्छा खत्म होगी तो अर्थव्यवस्था ज्यादा पारदर्शी होगी और राष्ट्रहित में धन का बेहतर उपयोग हो सकेगा। इससे रोजगार के ज्यादा साधन मुहैया कराए जा सकेंगे। कालाधन पर बंदिश लगेगी तो चुनावों में हो रहे कालेधन के उपयोग पर प्रतिबंध लग सकेगा। इससे वोटों की खरीद-फरोख्त की वजह से युवाओं के मन-मस्तिष्क में बन रही देश की गलत छवि की गुंजाइश खत्म हो सकेगी। नकली मुद्रा के चलन से बाहर होने पर आतंकवादियों और अराजक तत्वों पर शिकंजा कसा जा सकेगा। निश्चित तौर से मोदी का यह क्रांतिकारी फैसला देश में ईमानदारी, पारदर्शिता और तरक्की की नई फसल बोएगा। देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले पांच साल के कार्यकाल में ही उस मुकाम पर पहुंच सकेगा, जिसमें राष्ट्रहित और मानवीय मूल्यों की साफ सोच भारत के हर नागरिक के मन-मस्तिष्क में अंकित हो सकेगी। ‘सत्यमेव जयते’ की मंजिल पर पहुंचने का प्रयास कर हर नागरिक खुद को गौरवान्वित महसूस कर सकेगा।