Thursday, November 3, 2016

आज के युवाओं के सामने चुनौतियां...

यु वा और चुनौतियां एक दूसरे के पर्याय हैं। पर लग रहा है कि आज का युवा भविष्य की चुनौतियों से भाग रहा है। महानगरों में हालात ज्यादा खराब हैं। परिवारों के बिखराव और सिमटते परिवारों, बदलते सामाजिक सरोकारों, आसपास के परिवेश में आए बदलाव, आधुनिक जीवन शैली और संचार के बढ़ते साधनों ने बचपने को खत्म किया है तो युवाओं को भटकाया   भी है।

बच्चा छोटा होता है और जब बढ़ता है तो उसकी हरेक हरकत पर हम खुश होते हैं। घर के आंगन में उसकी लोटपोट और हर शैतानी को मां पिता ही नहीं पूरा परिवार सहजभाव से लेता है। लेकिन बचपने को सहजभाव से लेने के लिए जब परिवार ही तैयार नहीं है यही बच्चा बड़े होने की प्रक्रिया में कुछ ऐसी बातें करने लगता है तो नागवार होती हैं। बच्चों को बचपन से संस्कार सिखाने की परम्परा हमारे देश में रही है। संयुक्त परिवारों के बीच रहने से यह बेहद आसान होता है। घर के बड़े बुजुर्ग, बच्चों में ऐसी आदतों के बीज बो देते हैं जो ताउम्र उनके काम आती है। बच्चे के मस्तिष्क में बालकाल में जिस तरह के संस्कारों की छाप पड़ जाती है वह उसके भविष्य की धरोहर तो होती हैं बल्कि कई मौकों पर उसे सम्मान भी दिलाती हैं। 

वक्त के साथ बहुत कुछ बदलता चला गया और फिर बदलाव की यह गति तेज हो गई, बहुत कुछ इतना पीछे छूट गया कि उसे पाना असंभव हो गया। न अब बच्चों को दादा-दादी कहानियां सुनाकर सुलाते हैं ओर न ही मां को लोरियां आती हैं। यहां तक कि बच्चे के लालन पालन के लिए भी मां-बाप गूगल पर निर्भर हो गए हैं। हर समस्या का समाधान वह गूगल पर सर्च कर रहे हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि बच्चे की नैसर्गिक क्रियाओं को भी बाधित करने की कोशिश की जा रही है। मां-बाप के झगड़ों ने सिंगल पैरेंटिंग सिस्टम का नया जमाना ला दिया है। बच्चा बस किसी एक के पास पल रहा है। या बहुत छोटे या कहें माइक्रो फैमिली में पल रहा है तो अकेलेपन का अहसास बचपन से लेकर उसकी जवानी तक, उसे ड्रग्स सहित बुरी आदतों और संगत की तरफ आकर्षित कर रहा है। 

 एक समय था जब सिर पर सीधा हाथ रखकर उल्टी दिशा का कान जब तक पकड़ में न आए बच्चे को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाया जाता था, लेकिन आज जन्म के साल भर बाद ही झूलाघर में एडमिट करा दिया जाता है। महज तीन साल की उम्र में तो बच्चा बस्ता लेकर स्कूल जाने लगता है और तो और कक्षा पांच और अधिक से अधिक आठवीं तक पहुंचते पहुंचते तो उसे मोबाइल, कंम्यूटर सब हासिल हो रहा है। मां, बाप, शिक्षक और पास पड़ोस की बजाय यही अब उसके साथी हैं। जाहिर है, बचपन, किशोर अवस्था तक आते आते समय से पहले वयस्क हो रहा है। तर्क यह है कि जरूरतों को पूरा करने के लिए महंगाई के दौर में पति-पत्नी का काम करना जरूरी हो गया है। माता पिता की सोच यह है कि वह अपने बच्चे के लिए कुर्बानी दे रहे हैं लेकिन कर वह ठीक इसके विपरीत रहे हैं। उनका बच्चा जिस उम्र में है, उस उम्र में उसे संस्कार, परम्परा और अच्छी शिक्षा की जरूरत है। शिक्षा किताबी नहीं बल्कि वह जो उसे जीवनभर याद रहे। पर इसके लिए वक्त नहीं। अपनी सुविधाओं के लिए परिवार जो कभी संयुक्त थे, वह विखंडित होकर एकल में बदल गए। यानि कि बच्चे को पुरानी पीढ़ी से कोसों दूर करने की घातक कोशिश में हम सफल हो गए। हमने अपना भविष्य जिस बच्चे में देखा वह धीरे धीरे न जाने कब आपसे से ही विलग हो गया। वह इतना दूर चला गया कि उसने अपनी दूसरी दुनिया आबाद कर ली। दिन भर या तो टीवी या फिर मोबाइल या कंप्यूटर। घर में रहकर भी वह बेगाना हो गया। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए कभी दोस्तों का सहारा खोजा और नहीं तो नशे की ओर मुड़ गया। घर में रहकर भी उससे बात करना मुश्किल हो गया। अब इसका दोष उसके माथे तो मढ़ा नहीं जा सकता क्योंकि इसकी बुनियाद तो हम ही डाल रहे हैं। इसलिए बेहद जरूरी यह है कि हम भले ही कितने विकसित क्यों न हो जाएं बच्चों के लालन पालन में नैसर्गिक व्यवस्थाओं का पालन करें। अन्यथा जिस सुख की कल्पना कर रहे हैं वह कभी हासिल नहीं होगा। युवावस्था में भी आज के दौर में युवाओं के अच्छे मित्र उनके माता, पिता और शिक्षक ही हो सकते हैं। और कोई नहीं।

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