भारत को आज विश्व समुदाय में कई खासियत की वजह से जाना जाता है। उसमें भारतीय समाज की स्थिरता में सशक्त परिवार संस्था के योगदान की भूमिका महत्वपूर्ण है। परिवार संस्था में भी संयुक्त परिवार के महत्व को कभी भी नहीं नकारा जा सकता। दुर्भाग्य की बात यह है कि आधुनिकीकरण के दौर में संयुक्त परिवार में बिखराव का दौर चरम पर पहुंच रहा है। इससे कई बार परिवार के युवाओं को खासी तकलीफ होती है तो कभी परिवार के मुखिया ऐसी स्थितियों से खुद को टूटता हुआ महसूस करते हैं। फिलहाल नई पीढ़ी को परिवार के बिखराव का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। एक-दूसरे की भावनाओं को न समझना, त्याग की भावना का खत्म होना, परिवार में महिलाओं के आपसी झगड़े, संपत्ति को लेकर आपसी मनमुटाव जैसे कई कारण है, जो संयुक्त परिवार के विघटन की मजबूत नींव तैयार करते हैं। जिसका हश्र कई जिंदगियों के बिखरने के साथ होता है।
भारतीय समाज में संयुक्त परिवार का आधार एक मुखिया में सबका विश्वास होना था। घर का सबसे बड़ा सदस्य परिवार का मुखिया होता था। मुखिया अपने अधिकार और जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वाह भी करता था। उसे यह पता रहता था कि परिवार के हर सदस्य की क्या जरूरत है, किसी की भावनाएं तो आहत नहीं हो रही हैं, कोई कमियों से जूझने को मजबूर तो नहीं है...इसके लिए भले ही उसे खुद ही वंचित रहना पड़े लेकिन परिवार के सभी सदस्य खुशी से रह सकें, इस जिम्मेदारी का निर्वहन मुखिया भलीभांति करता था। पंडित दीनदयाल के अंत्योदय यानि कि सबसे कमजोर के उत्थान की तर्ज पर ही परिवार में भी मुखिया इस बात का खास ख्याल रखता था कि घर का छोटा सदस्य आगे बढ़ सके इसके लिए उसे बड़े सदस्यों की तुलना में ज्यादा महत्व देने में भी वह संकोच नहीं करता था। पर लोकतंत्र के इस दौर में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने इन संबंधों को तार-तार कर दिया है। संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं तो एकल परिवार के सदस्य तनाव के दौर से गुजरने को मजबूर हैं।
सनातन हिंदू समाज में संयुक्त परिवार की एक झलक रामचरित मानस में अयोध्या के राजा दशरथ के परिवार से देखी जा सकती है। जब उनके बड़े पुत्र राम के वन जाने का फैसला हुआ तो उन चारों भाईयों के बीच जो प्रेम का अटूट बंधन देखने को मिला, परिवार की उस संयुक्त व्यवस्था और इससे परिवार के हर सदस्य में पल्लवित एक-दूसरे के प्रति प्रेम की थाती को महसूस किया जा सकता है। राम के साथ लक्ष्मण ने भी महलों के सुख साधनों को त्यागकर भाई के साथ वन जाने का फैसला किया। वहीं जब भरत ने राजतिलक करवाने से भी इंकार कर दिया। जब राम ने जंगल से वापस लौटने से इंकार कर दिया तो राम की खडाऊं को सिंहासन पर रखकर बड़े भाई के सेवक के बतौर भरत ने चौदह साल तक कर्तव्यों का निर्वहन किया। यानि कि त्याग का कहीं कोई अंत देखने को नहीं मिलता।
त्याग करने में सबसे पहला नाम बड़े भाई राम का ही दर्ज हुआ और इसी वजह से संयुक्त परिवारों का महत्व आज तक बना हुआ है। पर ‘त्याग’, ‘प्रेम’ और ‘एक-दूसरे के प्रति समर्पण की भावना’ के खत्म होने से संयुक्त परिवार की व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। इसकी वजह से समाज में ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, धोखेबाजी का बोलबाला हो गया है और पूरा समाज खामियाजा भुगतने को मजबूर है।
भौतिक साधनों में खुशी ढूढ़ने की कोशिश भी अब खोखली साबित हो चुकी है। ऐेसी स्थिति में जरूरत है कि एक बार फिर भारत की मजबूत संयुक्त परिवार संस्था को पुनर्जीवित किया जाए। घर के बड़े सदस्य संकुचित भावनाओं को छोड़ने में समर्थ हों। परिवार में एक-दूसरे की भावनाओं की कद्र हो और राम की तरह मुखिया के अंदर त्याग, न्याय और समर्पण के भावों की झलक परिवार के अन्य सदस्यों के जीवन में खुशियों को लौटा सके। उम्मीद से आसमान है और इतिहास अपने आप को दोहराता है। इसके चलते एक बार फिर संयुक्त परिवार के दौर के लौटने की उम्मीद तो की ही जा सकती है कि फिर से राम की तरह विशाल ह्रदय लिए घर के मुखिया का किरदार लौटेगा, भरत और लक्ष्मण तो समाज में अब भी मौजूद हैं।
Bhaut accha jankari mile aap se.aaj aap ne samaj ka vha roop dikhaee diya jo samaj khota ja raha hai.me bhi hi kuchh परेशानियों से गुजरा हु. आपका लेख वाक्य में ही बहुत अच्छा और बहुत खास है आप ऐसे ही अन्य महत्व समाज में बताते रहे समाज मे ईससे भला होगा. धन्यवाद
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