प्रख्यात साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द्र ने कहा था कि कर्तव्य ही एक ऐेसा आदर्श है, जो कभी धोखा नहीं दे सकता। मुंशी प्रेमचन्द्र के इस कथन में यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि जिसने अपने कर्तव्य का ईमानदारी से निर्वहन कर लिया, वह भी आदर्श हो गया। वहीं जिसको लोगों ने आदर्श माना, वह कर्तव्यों की कसौटी पर सौ फीसदी खरा उतरा। इसमें वैसे तो हमारे देश भारत के आदिकाल से अब तक के हजारों नाम हैं, जिन पर यह वाक्य पूरी तरह से चरितार्थ होता है। आधुनिक काल में भी महापुरुषों की लंबी फेहरिस्त में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद सहित महापुरुषों, क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने कर्तव्य की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर लोगों के दिलों में अपनी विशेष जगह बनाई है। निश्चित तौर से ऐेसे समय पर देश के गौरव, भारत रत्न स्वर्गीय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का नाम कर्तव्य के पथ पर चलकर आदर्श बनने का अनुपम उदाहरण है। ऐेसा व्यक्तित्व जिसने कर्तव्य करते-करते ही अंतिम सांस ली। इस कड़ी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय और देश में राष्ट्रभक्ति, सेवा और समर्पण का पर्याय बन चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम भी महत्वपूर्ण है।
आदर्श स्थापित करने वाला व्यक्ति निश्चित तौर से अपने कर्तव्य का निर्वहन इस तरह से करता है, जिससे समाज और राष्ट्र के प्रति समर्पण और योगदान के प्रतिमान खुद-ब-खुद स्थापित हो जाते हैं। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व से साफ हो जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर तय करने के बीच नरेंद्र मोदी ने जिस तरह अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया है, वह राष्ट्र के प्रति समर्पण और निष्ठा की अद्भुत मिसाल है। गरीबी के चलते चाय बेचने से लेकर सर्वोच्च पद तक पहुंचने के बीच कभी भी उनका ईमान नहीं डिगा। संघ से लेकर प्रधानमंत्री के पद तक उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन इस तरह किया कि इसमें परिश्रम की पराकाष्ठा के साथ ईमानदारी और देशभक्ति के जज्बे को सेल्यूट किया जा सकता है। शायद यही वजह है कि आज के युवा का आदर्श नरेंद्र मोदी बन गए हैं। चाहे देश हो या विदेश, वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को चरितार्थ करते हुए प्रधानमंत्री मोदी सभी मंचों से लोक कल्याण का दिशा में वह हर प्रयास करते हैं जिससे सभी की भलाई हो। यही वजह है कि वे आज भारत की जगह पूरे विश्व में अपनी विशेष पहचान रखने वाले नेता बन गए हैं।
दूसरा उदाहरण एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का है। एकात्म मानववाद मानव जीवन व सम्पूर्ण सृष्टि के एकमात्र सम्बन्ध का दर्शन है। इसका वैज्ञानिक विवेचन पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ही किया था। यह दर्शन पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा 22 से 25 अप्रैल 1965 को मुम्बई में दिये गये चार व्याख्यानों के रूप में प्रस्तुत किया गया था। एकात्म मानव दर्शन के केंद्र में व्यक्ति,व्यक्ति से जुड़ा हुआ एक घेरा परिवार, परिवार से जुड़ा हुआ एक घेरा समाज, जाति, फिर राष्ट्र, विश्व और फिर अनंत ब्रम्हांड को अपने में समाविष्ट किये है। इस अखण्डमण्डलाकार आकृति में एक व्यक्ति से दूसरे, फिर दूसरे से तीसरे का विकास होता जाता है। सभी एक-दूसरे से जुड़कर अपना अस्तित्व साधते हुए एक दूसरे के पूरक एवं स्वाभाविक सहयोगी बन जाते हैं और इनमे कोई संघर्ष नहीं रहता। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने न केवल एकात्म मानववाद पर बल दिया, बल्कि अपनी जीवनशैली के जरिए जीवंत संदेश देने में सफल रहे। यही वजह है कि आज देश के अलग-अलग राज्यों में भाजपा की सरकारें दीनदयाल उपाध्याय को प्रेरणास्रोत मानते हुए एकात्म मानववाद और अंत्योदय के मंत्र पर अमल कर जनकल्याण में जुटी हैं।
जब बात मोदी और पंडित दीनदयाल की हो तो उस संगठन को नहीं बिसराया जा सकता, जिसकी वजह से इनका व्यक्तित्व साकार हो सका यानि कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। संघ और आरएसएस के नाम से प्रसिद्ध इस संगठन की स्थापना 27 सितंबर 1925 को डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है। महात्मा गांधी ने 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहां पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन् 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये। आदिकाल से अब तक हिन्दू धर्म के मुताबिक जिस भगवा ध्वज को आदर्श माना गया, उस भगवा ध्वज को ही संघ में गुरू मानकर वंदना की जाती है। संघ अपनी स्थापना से लेकर अब तक समर्पण, त्याग और सेवा की मिसाल बन चुका है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में इसकी भूमिका को जवाहर लाल नेहरू ने सराहा था, तो किसी भी प्राकृतिक आपदा में संघ अग्रणी भूमिका में अब भी विद्यमान रहता है।
कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवकों की बराबरी शायद ही कोई कर पाए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय हों, अटल बिहारी वाजपेयी हों या फिर नरेंद्र मोदी ... सभी ने ध्वज को प्रणाम किया है और इसे आदर्श मानते हुए राष्ट्र की सेवा में कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन किया है। संघ कर्तव्य और आदर्श का पर्याय बन चुका है। यह खुद ही एक सिद्ध मंत्र बन चुका है और यही वजह है कि राष्ट्रभक्त युवाओं के लिए संघ से जुड़ना अब गौरव की बात है।
Congratulations sir,you have written an excellent article that should raise lots of eyebrows. Of course much of your subject was your own hard-won experience in the matter.
ReplyDeleteNicely written blog.....Congratulations, I look forward to reading your next blog.
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