विचलन की जगह विकास, नकारात्मकता की जगह सकारात्मकता, कानून का उल्लंघन की जगह पालन करने की आदत, नशा की जगह सात्विकता, व्यभिचार की जगह संयम, लापरवाही की जगह अनुशासन ...युवाओं की डिक्शनरी में इस तरह के शब्द प्रभावी हो जाएं तो शायद युवा, राष्ट्र की असली धरोहर का पर्याय बन सकते हैं। हाल ही में मैंने इस तरह का एक उदाहरण देखा तो मन को सुकून मिला और यह उम्मीद भी जागी कि शायद 21 वीं सदी में स्वामी विवेकानंद के सपने साकार होने से अब कोई नहीं रोक सकता।
मामला राजधानी भोपाल के मौलाना आजाद नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी का है। रविवार को मुझे यहां के कुछ युवाओं से रूबरू होने का अवसर मिला। युवाओं से मिलने की मुझे तीव्र उत्कंठा और जिज्ञासा रहती है, क्योंकि युवाओं में रूपांतरित होते राष्ट्र की झलक साफ दिखाई देती है। मेनिट के युवा छात्रों ने बताया कि यहां मुफ्तखोरी में नशा बांटा जाता है। सीनियर छात्र सुनियोजित रणनीति के तहत जूनियर छात्रों का नशे की लत में धकेल देते हैं। शुरुआत में इसकी लत कंसन्ट्रेशन, अच्छा परफोर्मेंस और बेहतर कैरियर के लिए ज्यादा मेहनत के नाम पर डलवाई जाती है लेकिन अंतत: छात्रों के कैरियर पर ही बन आती है। पांच साल पहले यहां 60-70 छात्रों का एक ग्रुप ऐसा बना, जिसने किसी तरह का नशा न करने का संकल्प लिया। पांच साल में इस ग्रुप में छात्रों की संख्या लगभग चार सौ हो चुकी है। यानि कि इन चार सौ छात्रों को स्वहित में बेहतर सोचते हुए राष्ट्रहित के लिए बेहतर काम करने से अब कोई नहीं रोक सकता। मुमकिन है कि एक दिन भारत का हर युवा इस दिशा में सोचकर न केवल अपनी सकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोतरी करेगा बल्कि राष्ट्र को सकारात्मकता के चरम पर पहुंचाकर विश्व का सिरमौर बनाएगा।
इस समय देश में विभिन्न विचारधाराओं का व्यापक जोर है। हर विचारधारा युवाओं के जरिए पल्लवित, पोषित और प्रभावी होने का दम भरती है। इन विचारधाराओं में भी एक राष्ट्रवादी और दूसरी मुफ्तवादी विचारधारा को लेकर आजकल काफी चर्चा हो रही है। सामान्यत: देखा जाता है कि राष्ट्रवादी युवा पर पिछड़ी मानसिकता का ठप्पा लगाने की कोशिश की जाती है, जबकि मुफ्तवाद के प्रति युवाओं की मुग्धता बढ़ती जा रही है। देश में बढ़ता नव कल्चर, जिसमें नशा, अपराध सामान्य है। लेकिन युवाओं का एक वर्ग ऐेसा भी है, जो यह सोचता है कि देश में भी अपार संभावनाएं हैं, जिसके लिए युवाओं को एकता, अखंडता और राष्ट्रहित में सोचते हुए आगे बढ़ना होगा। इसके लिए समाज को भी बदलना होगा, क्योंकि राष्ट्रहित के लिए कई ऐेसे काम भी है जिसके लिए समाज तत्पर नहीं है। या फिर यूं कहें कि कुछ तथाकथित मुफ्तवादी समाज को राष्ट्रहित की दिशा में तत्पर नहीं होने देना चाहते।
स्वामी विवेकानंद जी ने 19 वीं सदी में युवाओं को आह्वान करते हुए कहा था कि "क्या तुम अपने राष्ट्र से प्रेम करते हो? अगर हां तो आओ साथ मिलकर संघर्ष करो। उस परम वैभव को पाने के लिए, और यदि इस संघर्ष पथ पर चले तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना है, तब भी नहीं जब अपना सबसे प्रिय एवं नजदीकी भी रो रहा हो। सिर्फ आगे बढ़ना निरंतर आगे।" मेनिट के सकारात्मक ऊर्जा से भरे हुए मुट्ठी भर छात्रों ने जिस तरह मुफ्तवादी नकारात्मक विचारधारा से न केवल संघर्ष किया, बल्कि विरोधियों से हर मोर्चे पर संघर्ष करते हुए सकारात्मकता का जो नया माहौल परिसर में तैयार किया, वह प्रेरणादायी और अनुसरण योग्य है।
निश्चित तौर से यही युवा पूंजी राष्ट्र को नवनिर्माण के मार्ग पर स्थापित करेगी। इनकी तरह ही देश के सभी युवाओं को एक संकल्प लेना चाहिए कि नकारात्मक विचारधारा का न केवल विरोध करेंगे, बल्कि मुफ्तवादी पतन के मार्ग पर धकेलने वाली इस विचारधारा के चंगुल से सभी युवाओं को बाहर निकालेंगे। निश्चित तौर से जब युवाओं का विचार बदलेगा तो इस राष्ट्र को बदलने में चंद दिन ही लगेंगे। स्वामी विवेकानंद का परम वैभव का सपना न केवल साकार होगा बल्कि हर युवा परम वैभव को प्राप्त करेगा।
एकदम सही बात है।युवाओं में सही सोच एवं दिशा सही संस्कारों से ही आएगी और ये संस्कार हमें सबको अपने घर से बच्चों में डालने होंगे क्योंकि आज का तरुण ही कल का युवा बनेगा एवं इस देश व समाज का भविष्य निर्धारित करेगा।अतः ये ही संपूर्ण सत्य है कि हम जो बोएंगे वो ही काटेंगे। बबूल के पेड़ से आम की उम्मीद करना बेमानी होगी।।
ReplyDeletePositive approach is solution of all problems. Truth & Positivity is god. It has to struggle hard but at the end negative shaitan will be defeated.
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